सागर सी गहराई हो
पर्वत सी ऊँचाई हो
रोम - रोम में खुशहाली हो
हर दिल में सच्चाई हो

शनिवार, 25 दिसंबर 2010

शुभकामना

रोग मुक्त हो तन सबका ,
आह्ल्लादित हो मन सबका  |
जीवन में नया उछाला हो ,
हर घर में नया उजाला हो |
हो जायें खुशियों की भरमार  ,
नव - वर्ष कहे यह बारम्बार  |  

नव - वर्ष

खुशियों का झुरमुट ले आया ,
 यह नव - वर्ष  अपार  |
हर पल , हर क्षण  मिले  सफलता ,
यह कहे - पुकार - पुकार  | 

शुक्रवार, 11 जून 2010

ग़ज़ल

तू पथ पर अपने चलता चल  |
मंजिल को पास बुलाता चल |
सभी समस्याओं का मिलकर ,
बात -चीत से  निकले  हल  |
कैसी भी हो आग भयानक  ,
कर सकते हो तुम शीतल  |
मंदिर हो या गुरुद्वारा हो  ,
शीश झुका दें  गंगा जल  |
चंदा -तारों से हम सीखें , 
कैसे रहते हैं यह हिलमिल |
निश्वार्थ भाव से नदिया कैसे ,
कल-कल कर बहती अविरल |
भेद न करती भारत माँ है  ,
सब पर फैलाये अपना आँचल |
पंकज द्वैष-भावना  त्यागो ,
जीवन बन जायेगा परिमल  |

बुधवार, 12 मई 2010

दोहा

प्राणी ऐसा जगत में , जन्म न लिया कोय  | 
होवे पूरा सदगुणी , अवगुण एक न होय  ||
पंकज विपदा  साथ दे , उसको अपना मान |
जस सुनार घिस- घिस करे ,सोने की पहचान  ||

बाबू

हैं गरीबी से जब सब निढाल बाबू |
गाल कैसे तुम्हारे गुलाल बाबू  | 
पान खाये लकालक बने घूमते  , 
कौन मुर्गा किया है हलाल बाबू  |
थोड़े वेतन से बंगला खड़ा कर लिया , 
खूब तुमने किया है कमाल बाबू  | 
हम तो रोटी की उलझन न सुलझा सके  ,
तुमने हल कर लिये सब सवाल बाबू  |
वक्त हमको रहा पीट हर मोड़ पर , 
तुमको छू भी सके क्या मजाल बाबू  |
जिन्दगी वह तुम्हारे लिये स्वर्ग है  , 
 हम तो जन्मों - जन्म  के बबाल बाबू  |

शनिवार, 8 मई 2010

मम्मी

आज मैं अपने ब्लॉग पर १००  वीं कविता प्रस्तुत करते हुए अपार प्रसन्नता का अनुभव कर रहा हूँ  | यह सब आप महान साहित्यकारों के प्यार ,सहयोग और आशीर्वाद के कारण ही संभव हो सका है , इसके लिये मैं आप सबका तहे दिल से आभार प्रगट करते हुए शुक्रिया अदा करता हूँ और आशा करता हूँ की भविष्य में भी ऐसे ही सहयोग प्रदान करते रहेंगे  | आज मातृ दिवस के विशेष अवसर पर  मैं पूजनीय मम्मी के लिये एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ  | आप सभी को मातृ दिवस की हर्दिक शुभकामनायें  |
प्यारी - प्यारी मेरी मम्मी |
सारे जग से न्यारी मम्मी  |
  तुझसे ऊँचा कोई नहीं है ,
बहुत दुलारी मेरी मम्मी  |
रोज सवेरे जगती मम्मी  |
मुझमें ध्यान लगाती मम्मी |
एक -एक आँसू पर मेरे  ,
आँसू- धार बहाती  मम्मी   |
गुर्वोपरि है मेरी मम्मी  |
देवोपरि है मेरी मम्मी  |
चलना उसने मुझे सिखाया ,
मेरी प्राणाधार  है मम्मी  |
सभी दुःख हर लेती मम्मी |
हम पर प्यार लुटाती मम्मी  |
अर्पण कर देती है  तन -मन ,
ममता -मूर्ति है मेरी मम्मी  |

दोहा

गोयटा जलता देखकर , गोबर हँसता जाय |
पंकज क्यों है हँस रहा , कल तेरी बारी आय ||  

शुक्रवार, 7 मई 2010

आँसू


आँसू  
विभीषण है ,
लंका का  |
निकलते ही 
कर देता है  ,
रहस्योदघाटन 
आंतरिक मन का |
थके जीवन का  |

अनिवार्य

भ्रष्टाचार 
उन्नति का ,
पर्याय 
बन गया है  |
इसीलिए -
महँगाई  होना 
अनिवार्य
हो गया है  |

चुभ रही है रोशनी

 

 पेट में मचने लगी है कुलबुली  |
दे रही दुःख नीति उनकी दुलमुली  |
हर व्यवस्था पंगु है सड़ती हुई   ,
हो पड़ी ज्यों लाश कोई अधजली  |
चैन से भी  बैठने   देती   नहीं    ,
भूख की विकराल चिंता चुलबुली  |
होंठ से प्याला लगायें किस तरह ,
नाक पार बैठी हुई है छिपकली    |
हर अँधेरे को बुला लो इस जगह ,
चुभ रही है रोशनी यह दिलजली  |
लग रहा है क्रान्ति कोई ला रहा  ,
भीड़ में होने लगी है खलबली  |

मुक्तक

बदलते हुए परिवेश में , जरा देश देखिये  |
फैशन रहा है बोल  ,    जरा केश देखिये  |
मखमली सेज पर महलों में सो रहे हैं जो,
वह दे रहें हैं युद्ध का  ,  आदेश देखिये  |

सोमवार, 3 मई 2010

मुक्तक

इज्म की बैसाखियों से ,चाँद पाया आपने  |
संदिग्ध मेघों के सहारे ,रवि छिपाया आपने  |
क्षणिक है आनंद तेरा ,तुम  यह न भूलो  ,,
शेष कुछ भी न बचेगा ,तूफां आने की देर है  |

अब तो आकर के जरा

तन्हाइयों के बीच गुम- सुम ,
मैं कब तलक  बैठा रहूँ  |
अब तो आकर के जरा  ,
कुछ तो मुझे समझाइये |
नयन व्याकुल हो रहें हैं ,
दरश को -तेरे लिये   |
अब तो आकर के जरा ,
दर्शन मुझे दिखलाइये  |
गम मिला जीवन में मुझको ,
शिकवा नहीं करता हूँ मैं  |
अब तो आकर के जरा ,
उस दर्द को सहलाइये |
आँसू नयन के चाहते हैं ,
राज कहना सब जगह  |
अब तो आकर के जरा ,
पलकों पर मेरी छा जाइये  |
 

शनिवार, 1 मई 2010

उत्थान

हिन्दी संस्थान के ,
अध्यक्ष ने ,
हिन्दी उत्थान का ,
 बीड़ा उठाया है  |
इसीलिए ,उसने
अपने बच्चे को ,
एक ,
अच्छे कान्वेंट में ,
भिजवाया है  |

व्यापार

देखो मानुष कर रहा  ,है  मौतों का व्यापार |
पंकज यह क्या हो रहा , हर घर अत्याचार  ||
दूल्हा देखो बिक रहा ,खड़ा है बीच बाज़ार  |
लाख -लाख का मोल है ,कैसा यह व्यापार  ||

शुक्रवार, 30 अप्रैल 2010

सीता हरण

तुम्हारा संवरण होगा  |
हमारा तो मरण होगा  |
अगर यूँ रूठ जाओगे  ,
हृदय किसकी शरण होगा  |
रहा मन सोचता कब से  ,
कि कैसा आचरण होगा  |
हजारों फासले कर पार ,
पहला यह चरण होगा  |
किसे था ज्ञात यूँ नभ में ,
हुताशन  का क्षरण होगा  |
शहर की सघन बस्ती से ,
नया सीता हरण होगा  |
पंकज सिर घुन रहे होंगे ,
त्रिशूलों का वरण होगा  |

बुधवार, 28 अप्रैल 2010

गाँव

लोग जब रहते नहीं इस गाँव में  |
चाँदनी क्यों आ गयी इस गाँव में |
झाँक कर बेचैन सी जिस -तिस गली ,
खोजती है  क्या यहाँ इस गाँव में  |
दो बता इसको जरा हौले चले  ,
सो रहें सौ दर्द  हैं इस गाँव में  |
कैक्टस  हैं  शून्य गलियों में उगे ,
चुभ न जाये शूल कोई गाँव में  |
फन उठाये हैं खड़े विषधर यहाँ  ,
किन्तु विषहर हैं नहीं इस गाँव में  | 
   



 

रविवार, 18 अप्रैल 2010

आदमी

बैठकर बारूद पर ,  तीली जलाता आदमी  |
लगाकर आग अपने गाँव में , है घर बचाता आदमी |
मंदिरों और मस्जिदों में , है भेद करता आदमी  |
पंख जिसके कट चुके हैं , वह  उड़ रहा है आदमी  |
विश्व्व की वायु प्रदूषित हो गयी जो , उस हवा को पी रहा है आदमी  |
किस पर करोगे विश्वास अब तुम ,आस्तीनी  साँप बन चुका है आदमी  |

संकल्प

      अनगिनत सितारें लाख चमकें , तम वक्ष चीर सकते नहीं हैं  |
          भले ही बिछे हों शूल पथ में , शूल पथ रोक सकते नहीं हैं  |
                 हौसलों  को पस्त न करना , हिमालय तक चले जाओ ,,
                     समर्पण तुम्हारा अगर सत्य है , तो मंजिलें तुम्हे रोक सकती नहीं हैं  |

बुधवार, 14 अप्रैल 2010

धर्म- गुरु

लम्बा तिलक लगाकर भैया ,
लम्बी माला गले में डालो  |
पहन कर चोंगा धर्म- गुरु का ,
जो चाहो सो तुम कर डालो  |
नेताओं को साथ में लेकर ,
परमार्थ -निकेतन धाम बनाओ  |
गोरख -धन्धा करो और घूमो , 
पूरे देश पर रंग जमाओ  |
धर्म- गुरु के नाम पर तुझसे ,
हर अफसर भी घबराएगा  |   
राजनीति के संरक्षण में ,
तू सदा फूलता जायेगा  |
राम नाम को साथ में लेकर ,
जिसको चाहो ,मंत्री बनवाओ |
मंगल ,शनि की दशा बताकर ,
जो चाहो, उनसे करवाओ  |


मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

सूरज


 रोज सवेरे सूरज आकर ,
जग में उजियाला करता  |
चाहे कोई धर्म , मजहब हो ,
उनमे भेद नहीं करता  |
जीवन पथ पर बढते जाओ ,
हमको राह दिखाता है  |
कर्तव्य मार्ग से डिगो नहीं ,
हमको यही सिखाता है  |

भारत देश

राम -कृष्ण की जन्म भूमि है ,
प्यारा अपना देश   |
जगद गुरु यह कहलाता है ,
प्यारा भारत देश  |
भिन्न - भिन्न हैं वर्ण यहाँ ,
भिन्न -भिन्न हैं बोली  |
भिन्न -भिन्न त्यौहार यहाँ पर ,
सब मिलकर खेलें होली  |
यहाँ हिन्दू औ मुसळमाँ  सब ,
जाते हैं कावा - काशी |
एक सूत्र में बंधें  हुए  हैं ,
हम सच्चे भारत वासी  | 

तारे

यह आसमान के नन्हें तारे ,
चमक  रहे सब मिलकर सारे  |
चन्दा से हैं हाथ मिलाते ,
आसमान में दौड़ लगाते  |
अम्बर से गहरा रिश्ता है ,
यह फूलों का गुलदस्ता है  |
कोई न इनको गिन सकता है ,
कोई न इनको छू सकता है  |

जिन्दगी

कभी आग का शोला बन ,दहकती है जिन्दगी  |
कभी किसी का प्यार बन , भटकती है जिन्दगी  |
जब - जब सींची गयी, यह श्रम  के  लहू  से  ,,
तब उजड़े हुए चमन में , महकती है जिन्दगी  ||

शनिवार, 10 अप्रैल 2010

मुक्तक

मासूमों की आँखों में मैंने , जलते अंगारों को देखा  |
निर्दोषों  की हत्याओं से , शोणित धारों को बहते देखा  |
न्याय व्यवस्था पंगु हो गयी , सत्य  पड़ा लाचार जहाँ ,,
उन नगरों के गलियारों में , उठती चीत्कारों को देखा  ||

सावधान !


सावधान ! उनसे रहो , जो बोलें मधु सम बोल  |
विश्वास पात्र होते नहीं ,  भेद न उनसे  खोल  ||

दोहा

ठेके देखो शहर के , पा गये मंत्री- दामाद  |
अब कौन बचाये शहर को , होने से बरबाद || 

मुक्तक

तुम यदि ठान लो  तो, सूर्य अश्वों का भी मुँह मोड़ सकते हो   |
तुम यदि ठान लो तो , मदमस्त तूफ़ान को भी रोक सकते हो  |
तुम  भरत - पुत्र  हो , अपने को पहचानो  ................. ,
चाँद करे यदि गद्दारी  , तो राहू को चाँद बना सकते हो   |

मुक्तक

नैया मैंने तुमको दे दी , पर पतवार नहीं दूँगा  |
अनवरत सिलसिला मौतों का ,यह अधिकार नहीं दूँगा  |
सौगंध बाबा अमरनाथ की लेकर मैं कहता हूँ   ,
कश्मीर हमारा प्यारा है , तुमको कश्मीर नहीं दूँगा  |

बुधवार, 7 अप्रैल 2010

मुक्तक

बिकता है देखो न्याय जहाँ , ऐसे यह न्यायालय हैं  |
सत्ता के गलियारे देखो , बने आज वैश्यालय हैं  |
ओहदों को लेकर घूम रहें वो  , चम् -चम् करती कारों में ,
मंत्रियों के राज महल बन गये , चोरों  के मुख्यालय हैं  |

मुक्तक



 शूल भी क्या फूल भी सब कँटीले हो गये  |
डालियों पर जो लगाये फल कसैले हो गये  |
बात किसकी अब करूँ आदमी या जानवर की ,
आदमी तो जानवर से भी विषैले हो गये   |

रविवार, 4 अप्रैल 2010

मुक्तक

शूल मेरा क्या करेंगे , जब शूल पथ मैंने लिया है  |
सिन्धु मंथन जब हुआ , सारा गरल मैंने पिया है  |
तोप के सम्मुख , वक्ष - ताने हम  खड़े  हैं   ,
जीभ मेरी जल न पाती , आग का भोजन किया है  |      

मुक्तक

चीर कर वक्ष देख आओ , व्योम का आधार क्या है  |
नाप कर उर देख आओ , धरा का आकार क्या  है  |
तुम युग के सूरज हो , युग मानव हो ------
झाँक कर तुम देख आओ , क्षितिज के पार क्या है    | 

मुक्तक

बम दिखाकर तुम मुझे भयभीत करना चाहते हो  |
दनुजता  का  साथ देकर  रक्त  भरना चाहते   हो   |
पंख तो पाये नहीं पर व्योम चुम्बन की पिपासा  ,
सूर्य - निगलोगे  , नहीं , वे मौत मरना चाहते  हो  |

शनिवार, 3 अप्रैल 2010

मुक्तक

मैंने तो दीप जलाये थे  , फिर अंधिआरी कैसे आ छायी  |
मैंने तो पुष्प सँजोएँ  थे  , फिर नागफनी कैसे उग आयी  |
रात - रात बेचैन रहा , निद्रा को तजकर   ----------
मैंने तो सिन्दूर सजाया था  , फिर राखी कैसे ले आयी   |

मानवता

मानवता  बदल चुकी जब दानवता में  ,
तो भले गुलाबों में  , क्यों यह ठहरेगी  |
जब घर - घर में नागफनी , उग आयी हो   ,
तो सदा  मनुजता  , काँटों में ही सिहरेगी  |

नेता

गरीबी मत दिखाओ  , छिन जायेगी  |
रोटी बचाओ अपनी  , छिन जायेगी  |
देखो अरे  ,   नेता आ रहा है  ---
जिन्दगी बचाओ अपनी , छिन जायेगी  |

आँसू

कभी बनकर निकलते हैं ,
दिलों बहार यह आँसू   |
कभी बनकर छलकते हैं  ,
ग़मों बौछार यह आँसू  |
मंथन यहाँ होता  ,
दिलों - दिमाग पर जब हैं |
हैं , दिखाते जिन्दगी   की  ,
तस्वीर यह आँसू  |

गुरुवार, 1 अप्रैल 2010

दोहा

धनी  हुआ तो क्या हुआ  , जो करे  न कौड़ी दान   |
जीवन उसका व्यर्थ है  , जो जीता बिन सम्मान  ||
जग की चिंता न करे , लक्ष्य , जो पाना होय  |
पथ में भूकें श्वान से  , पथ नहिं बाधित होय  ||
भाग्य सहारे बैठकर , मत  छोड़े  तू  आस  |
बुद्धि ,शक्ति ,ज्ञान- बल , सब कुछ तेरे पास  ||
पंकज परिवर्तन देखकर  , काहे चित्त अधीर  |
लाभ - हानि के सोच में , मुद्रा क्यों गम्भीर  ||

सोच

किसी को क्या पड़ी है ,
तुझे नीचा दिखाने की   |
तेरे आमाल काफी हैं  ,
तेरी हस्ती मिटाने को   |

शुक्रवार, 26 मार्च 2010

मुक्त्तक

भीख माँगों  न उनसे , जो खुद माँगतें  हैं   |
सहारा माँगों न उनसे , जो खुद छीनतें हैं   |
शीश मत झुकाना कभी , उनके सामने ,
बैसाखियों पर दूसरों की , जो मौज करतें हैं  |

शनिवार, 20 मार्च 2010

बदलना चाहिए

जहाँ चाँद मिथ्या दर्प से इठला रहा हो |
सितारें विषमताओं की बात बोलें  |
सूर्य कतरा धूप पर , करता हो दलाली  |
गगन के परिवार में , जहाँ हों अपरिमित भेद ,
ऐसा नभ बदलना चाहिए |
नर महा निर्माण का यह सिलसिला |
मुझको लीक पर ही, सदा चलता मिला |
परम्पराएं विषैली ,हों गयीं हैं  जहाँ  |
राहें भुलाने पर तुली हों अब जहाँ  ,
ऐसा पथ बदलना चाहिए |
जहाँ देहरी पर विषमताओं की कीलें जड़ीं  हों |
चहुँओर  आँगन में समस्याएं मुहँ बाएँ खड़ीं हों  |
जिससे मिलाता हाथ , वोह तो काट लेता  |
जिसको समझता भ्रात, वोह  तो नाग  होता  |
दोहरी प्रकृति के लोग रहतें हों जहाँ ,
ऐसा घर बदलना चाहिए |
नीड़  का निर्माण करना , सोच का यह धर्म है |
जन्मते , मरते पाऊँ शिखर यह  कर्म  है  |
सम्भोग से सन्यास तक|
आवास से आकाश तक|
अधूरा बिम्ब जो देता रहा ,
ऐसा दर्पण बदलना चाहिए |




मुक्त्तक

                                                                             

साधना को तुम मेरी , रीति न कहना  |
विश्वास लिख रहा हूँ , गीत न कहना  |
दीप , तिमिर से प्यार जब करने लगे ,
सूर्य आने तक उसे , तुम प्रीति न कहना |

शनिवार, 13 मार्च 2010

मुक्त्तक

                                   
महाभारत  होना तो निश्चित है , अर्जुन को गाण्डीव उठाना होगा |
रण बीच खड़ा जब दुश्मन हो , तो शंखनाद करना होगा  |
जब कपट खेल खेलना , चाहता  हो काल ,
तो कैलाश छोड़ शंकर को , धरती पर आना होगा  |
सदिंयों से हम छमा दिखातें आयें हैं  |
खुलें हृदय से प्यार लुटाते आयें हैं  |
कोरी उदारता जब कायरता बन जाये ,
तो मर्यादा छोड़ , त्रिशूल चलाना होगा  |   


मंगलवार, 19 जनवरी 2010

मैं हूँ कोयल

मैं हूँ कोयल प्यारी प्यारी ,
हर पक्षी से मैं हूँ न्यारी  |
डाल  - डाल फुदक -फुदक कर ,
मैं मीठा गीत सुनाती हूँ  |
बागों की मैं रानी हूँ  ,
सबमें खुशहाली लाती हूँ |
मीठे -मीठे सन्देशों से ,
सबका दर्द मिटाती हूँ  |
मैं हूँ कोयल मतवाली ,
मैं हूँ कोयल काली -काली ,
मिसरी जैसी  मेरी बोली ,
मेरी कोयलिया कूँ - कूँ से ,
झूम उठे क्यारी -क्यारी |
मैं हूँ कोयल प्यारी -प्यारी |
हर पक्षी से मैं हूँ न्यारी  |

बसंत

सुखद बहारें लेकर आया , फिर से आज बसंत  |
मौसम है रंगीन हर तरफ नीले अम्बर के नीचे ,
प्यारी - प्यारी धूप लग रही आज शीत का हो गया अन्त  |
सुखद बहारें लेकर आया , फिर से आज बसंत  |
बाग़ - बगीचों की शोभा लगती है कितनी प्यारी ,
खुशहाली के इस दिन पर झूम रही क्यारी -क्यारी ,
पीले -पीले पुष्प सुनाते यह सन्देश हैं हमको  ,
उठो - उठो देखो हर ओर नभ में छाया आज बसंत  |
सुखद बहारें लेकर आया , फिर से आज बसंत  |
विद्या की देवी सरस्वती हम पर प्यार लुटाती है  ,
इसीलिए इस दिन पर देखो  उसकी पूजा होती है ,
इस दिन पर कोयल  हमको  मीठा गीत सुनाती है ,
कोयल के मीठे स्वर कुंजन में बहता आया आज बसंत |
सुखद बहारें लेकर आया , फिर से आज बसंत  |
स्वच्छ   आसमां  लगता है इस दिन कितना प्यारा ,
रंगीन पतंगों से है देखो  भरा  हुआ  नभ   सारा  ,
पीली - पीली सरसों के संग आया है फलदार बसंत  |
सुखद बहारें लेकर आया , फिर से आज बसंत  |

 

रविवार, 10 जनवरी 2010

टमाटर

लाल टमाटर प्यारा है ,
हर सब्जी से न्यारा है  |
जो भी इसको खाता है ,
चुस्ती - फुर्ती पाता है  |
कभी नहीं  हो  वह  बीमार ,
सारे जग का पाये प्यार  |

अनार

  जो भी खाये लाल अनार ,
शक्ति पाये अपरम्पार   |
लाल - लाल तन दमके उसका ,
हीमोग्लोबिन का भंडार   ||

नव - वर्ष मंगलमय हो

जीवन में आयें नए ,
नए - नए नित हर्ष   |
मंगल - मय हो , हर्ष मय ,
सुख मय नूतन वर्ष  | |
ओम प्रकाश अडिग 
रोशन गंज , शाहजहांपुर  २४२००१
मो . न. 09936141826

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मेरे बारे में

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नाम : आदेश कुमार पंकज पिता का नाम :( स्व०) श्री किशोरी लाल गुप्ता माता का नाम : श्रीमती पुष्पावती गुप्ता जन्म तिथि : ३०.०६ 1963 जन्म स्थान : शाहजहाँपुर (उ .प्र .) शिक्षा : एम ० एस - सी० ( गणित शास्त्र ) एम ० ए० ( अर्थ शास्त्र ) बी० एड० साहित्यिक परिचय : अनेकों कहानी व् कविताएँ विभिन्न पत्र - पत्रिकाओं में प्रकाशित | आकाशवाणी लखनऊ से बाल कविताएँ प्रचारित | अनेकों कवि सम्मेलनों कि अध्यक्षता व् संचालन | कस्तूरी कंचन आगमन संस्था द्वारा प्रकाशित एवम दोहा कलश संयुक्त दोहाकारों के रूप में प्रकाशाधीन | पुरस्कार : अखिल भारतीय वैश्य समाज शाहजहाँपुर द्वारा वैश्य रत्न से सम्मानित | कई कवि सम्मेलनों में विशेष सम्मान | माननीय शिक्षा मंत्री भारत सरकार श्रीमती स्मृति ईरानी द्वारा सम्मानित | विधालय प्रबंधन द्वारा लगातार आठ वर्षों से सम्मानित | वर्तमान में आदित्य बिरला पब्लिक स्कूल , रेनुसागर , सोनभद्र (उ ,प्र .) में प्रवक्ता गणित शास्त्र के पद पर कार्य रत | संपर्क : जूनियर ४५ - ए रेनुसागर ,सोनभद्र (उ.प्र.)- २३१२१८ मोब .नंबर . ९४५५५६७९८१

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