संदेश

पंकज के दोहे

साहस कभी न छोड़िये,देख मुसीबत मीत ।  रहा अडिग चट्टान सा ,उसने पायी जीत ।।  साहस जीवन में भरे ,मित्र सुनो नव रंग ।  आस पास के लोग सब ,रहते उसके संग।।  पंकज साहस व्यक्ति का ,है अचूक हथियार ।  इसके सफल प्रयोग से ,होती कभी न हार ।।  नाव फँसी मझधार में ,मत छोड़ो पतवार ।   साहस से बढ़ते चलो , हो जाओगे पार ।।  साहस से विपदा टले ,मन में रख विश्वास ।   दुश्मन भी आये नहीं ,पंकज तेरे पास।।

जिम्मेदारी जिसे मिली ,वह चोरों का सरदार लग रहा

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मित्रों प्रस्तुत है एक नया गीत

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मित्रों आइये सुनते हैं गीत ऋषि आ.डाँ. गोपाल दास नीरज जी का एक गीत ।

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घनाक्षरी

गोकुल के ग्वाल बाल,संग खेलें नंद लाल , कदम्ब पर बैठ कर , वो वंशी बजाते  हैं ।  बरसात हो रही थी , घनी रात हो रही थी ,   इक - ऊँगली पर , गोवर - धन  उठाते हैं।  घर -  घर छिपकर  ,  नए - रूप धर कर ,  सब मित्रों के संग मिल , माखन चुराते हैं।   गलियों में घूम - घूम नाच रहे झूम - झूम ,  सभी गोपियों के संग ,वह  रास रचाते हैं ।  आदेश कुमार पंकज 

घनाक्षरी

वो अयोध्या के चन्दन,वो कौशल्या के नंदन ,श्री राम प्रभुजी हम सबको हर्षाते हैं | राज मोह  छोड़कर ,वो  आज्ञा को मानकर ,लखन सहित सीता ,राम वन जातें हैं | रावण को मारकर, संतों को उबारकर , वो  भक़्त बिभीषण को,  राज दिलवाते हैं | लोक मत सुनकर, निर्दयी मन बनके , वो सीता को त्यागने का, फैसला सुनाते हैं | आदेश कुमार पंकज 

मुक्तक

सत्ता के लोलुप लोगों के , क्या विचार हैं आप देखिये | मर्यादाओं का चीर हरण ,करते यह तार तार देखिये |           कौन भला है ,कौन बुरा है ,सब तो हैं चट्टे - बट्टे , भाई को भाई से मरवाने ,का करते व्यापार देखिये ||