सागर सी गहराई हो
पर्वत सी ऊँचाई हो
रोम - रोम में खुशहाली हो
हर दिल में सच्चाई हो

शुक्रवार, 30 अप्रैल 2010

सीता हरण

तुम्हारा संवरण होगा  |
हमारा तो मरण होगा  |
अगर यूँ रूठ जाओगे  ,
हृदय किसकी शरण होगा  |
रहा मन सोचता कब से  ,
कि कैसा आचरण होगा  |
हजारों फासले कर पार ,
पहला यह चरण होगा  |
किसे था ज्ञात यूँ नभ में ,
हुताशन  का क्षरण होगा  |
शहर की सघन बस्ती से ,
नया सीता हरण होगा  |
पंकज सिर घुन रहे होंगे ,
त्रिशूलों का वरण होगा  |

बुधवार, 28 अप्रैल 2010

गाँव

लोग जब रहते नहीं इस गाँव में  |
चाँदनी क्यों आ गयी इस गाँव में |
झाँक कर बेचैन सी जिस -तिस गली ,
खोजती है  क्या यहाँ इस गाँव में  |
दो बता इसको जरा हौले चले  ,
सो रहें सौ दर्द  हैं इस गाँव में  |
कैक्टस  हैं  शून्य गलियों में उगे ,
चुभ न जाये शूल कोई गाँव में  |
फन उठाये हैं खड़े विषधर यहाँ  ,
किन्तु विषहर हैं नहीं इस गाँव में  | 
   



 

रविवार, 18 अप्रैल 2010

आदमी

बैठकर बारूद पर ,  तीली जलाता आदमी  |
लगाकर आग अपने गाँव में , है घर बचाता आदमी |
मंदिरों और मस्जिदों में , है भेद करता आदमी  |
पंख जिसके कट चुके हैं , वह  उड़ रहा है आदमी  |
विश्व्व की वायु प्रदूषित हो गयी जो , उस हवा को पी रहा है आदमी  |
किस पर करोगे विश्वास अब तुम ,आस्तीनी  साँप बन चुका है आदमी  |

संकल्प

      अनगिनत सितारें लाख चमकें , तम वक्ष चीर सकते नहीं हैं  |
          भले ही बिछे हों शूल पथ में , शूल पथ रोक सकते नहीं हैं  |
                 हौसलों  को पस्त न करना , हिमालय तक चले जाओ ,,
                     समर्पण तुम्हारा अगर सत्य है , तो मंजिलें तुम्हे रोक सकती नहीं हैं  |

बुधवार, 14 अप्रैल 2010

धर्म- गुरु

लम्बा तिलक लगाकर भैया ,
लम्बी माला गले में डालो  |
पहन कर चोंगा धर्म- गुरु का ,
जो चाहो सो तुम कर डालो  |
नेताओं को साथ में लेकर ,
परमार्थ -निकेतन धाम बनाओ  |
गोरख -धन्धा करो और घूमो , 
पूरे देश पर रंग जमाओ  |
धर्म- गुरु के नाम पर तुझसे ,
हर अफसर भी घबराएगा  |   
राजनीति के संरक्षण में ,
तू सदा फूलता जायेगा  |
राम नाम को साथ में लेकर ,
जिसको चाहो ,मंत्री बनवाओ |
मंगल ,शनि की दशा बताकर ,
जो चाहो, उनसे करवाओ  |


मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

सूरज


 रोज सवेरे सूरज आकर ,
जग में उजियाला करता  |
चाहे कोई धर्म , मजहब हो ,
उनमे भेद नहीं करता  |
जीवन पथ पर बढते जाओ ,
हमको राह दिखाता है  |
कर्तव्य मार्ग से डिगो नहीं ,
हमको यही सिखाता है  |

भारत देश

राम -कृष्ण की जन्म भूमि है ,
प्यारा अपना देश   |
जगद गुरु यह कहलाता है ,
प्यारा भारत देश  |
भिन्न - भिन्न हैं वर्ण यहाँ ,
भिन्न -भिन्न हैं बोली  |
भिन्न -भिन्न त्यौहार यहाँ पर ,
सब मिलकर खेलें होली  |
यहाँ हिन्दू औ मुसळमाँ  सब ,
जाते हैं कावा - काशी |
एक सूत्र में बंधें  हुए  हैं ,
हम सच्चे भारत वासी  | 

तारे

यह आसमान के नन्हें तारे ,
चमक  रहे सब मिलकर सारे  |
चन्दा से हैं हाथ मिलाते ,
आसमान में दौड़ लगाते  |
अम्बर से गहरा रिश्ता है ,
यह फूलों का गुलदस्ता है  |
कोई न इनको गिन सकता है ,
कोई न इनको छू सकता है  |

जिन्दगी

कभी आग का शोला बन ,दहकती है जिन्दगी  |
कभी किसी का प्यार बन , भटकती है जिन्दगी  |
जब - जब सींची गयी, यह श्रम  के  लहू  से  ,,
तब उजड़े हुए चमन में , महकती है जिन्दगी  ||

शनिवार, 10 अप्रैल 2010

मुक्तक

मासूमों की आँखों में मैंने , जलते अंगारों को देखा  |
निर्दोषों  की हत्याओं से , शोणित धारों को बहते देखा  |
न्याय व्यवस्था पंगु हो गयी , सत्य  पड़ा लाचार जहाँ ,,
उन नगरों के गलियारों में , उठती चीत्कारों को देखा  ||

सावधान !


सावधान ! उनसे रहो , जो बोलें मधु सम बोल  |
विश्वास पात्र होते नहीं ,  भेद न उनसे  खोल  ||

दोहा

ठेके देखो शहर के , पा गये मंत्री- दामाद  |
अब कौन बचाये शहर को , होने से बरबाद || 

मुक्तक

तुम यदि ठान लो  तो, सूर्य अश्वों का भी मुँह मोड़ सकते हो   |
तुम यदि ठान लो तो , मदमस्त तूफ़ान को भी रोक सकते हो  |
तुम  भरत - पुत्र  हो , अपने को पहचानो  ................. ,
चाँद करे यदि गद्दारी  , तो राहू को चाँद बना सकते हो   |

मुक्तक

नैया मैंने तुमको दे दी , पर पतवार नहीं दूँगा  |
अनवरत सिलसिला मौतों का ,यह अधिकार नहीं दूँगा  |
सौगंध बाबा अमरनाथ की लेकर मैं कहता हूँ   ,
कश्मीर हमारा प्यारा है , तुमको कश्मीर नहीं दूँगा  |

बुधवार, 7 अप्रैल 2010

मुक्तक

बिकता है देखो न्याय जहाँ , ऐसे यह न्यायालय हैं  |
सत्ता के गलियारे देखो , बने आज वैश्यालय हैं  |
ओहदों को लेकर घूम रहें वो  , चम् -चम् करती कारों में ,
मंत्रियों के राज महल बन गये , चोरों  के मुख्यालय हैं  |

मुक्तक



 शूल भी क्या फूल भी सब कँटीले हो गये  |
डालियों पर जो लगाये फल कसैले हो गये  |
बात किसकी अब करूँ आदमी या जानवर की ,
आदमी तो जानवर से भी विषैले हो गये   |

रविवार, 4 अप्रैल 2010

मुक्तक

शूल मेरा क्या करेंगे , जब शूल पथ मैंने लिया है  |
सिन्धु मंथन जब हुआ , सारा गरल मैंने पिया है  |
तोप के सम्मुख , वक्ष - ताने हम  खड़े  हैं   ,
जीभ मेरी जल न पाती , आग का भोजन किया है  |      

मुक्तक

चीर कर वक्ष देख आओ , व्योम का आधार क्या है  |
नाप कर उर देख आओ , धरा का आकार क्या  है  |
तुम युग के सूरज हो , युग मानव हो ------
झाँक कर तुम देख आओ , क्षितिज के पार क्या है    | 

मुक्तक

बम दिखाकर तुम मुझे भयभीत करना चाहते हो  |
दनुजता  का  साथ देकर  रक्त  भरना चाहते   हो   |
पंख तो पाये नहीं पर व्योम चुम्बन की पिपासा  ,
सूर्य - निगलोगे  , नहीं , वे मौत मरना चाहते  हो  |

शनिवार, 3 अप्रैल 2010

मुक्तक

मैंने तो दीप जलाये थे  , फिर अंधिआरी कैसे आ छायी  |
मैंने तो पुष्प सँजोएँ  थे  , फिर नागफनी कैसे उग आयी  |
रात - रात बेचैन रहा , निद्रा को तजकर   ----------
मैंने तो सिन्दूर सजाया था  , फिर राखी कैसे ले आयी   |

मानवता

मानवता  बदल चुकी जब दानवता में  ,
तो भले गुलाबों में  , क्यों यह ठहरेगी  |
जब घर - घर में नागफनी , उग आयी हो   ,
तो सदा  मनुजता  , काँटों में ही सिहरेगी  |

नेता

गरीबी मत दिखाओ  , छिन जायेगी  |
रोटी बचाओ अपनी  , छिन जायेगी  |
देखो अरे  ,   नेता आ रहा है  ---
जिन्दगी बचाओ अपनी , छिन जायेगी  |

आँसू

कभी बनकर निकलते हैं ,
दिलों बहार यह आँसू   |
कभी बनकर छलकते हैं  ,
ग़मों बौछार यह आँसू  |
मंथन यहाँ होता  ,
दिलों - दिमाग पर जब हैं |
हैं , दिखाते जिन्दगी   की  ,
तस्वीर यह आँसू  |

गुरुवार, 1 अप्रैल 2010

दोहा

धनी  हुआ तो क्या हुआ  , जो करे  न कौड़ी दान   |
जीवन उसका व्यर्थ है  , जो जीता बिन सम्मान  ||
जग की चिंता न करे , लक्ष्य , जो पाना होय  |
पथ में भूकें श्वान से  , पथ नहिं बाधित होय  ||
भाग्य सहारे बैठकर , मत  छोड़े  तू  आस  |
बुद्धि ,शक्ति ,ज्ञान- बल , सब कुछ तेरे पास  ||
पंकज परिवर्तन देखकर  , काहे चित्त अधीर  |
लाभ - हानि के सोच में , मुद्रा क्यों गम्भीर  ||

सोच

किसी को क्या पड़ी है ,
तुझे नीचा दिखाने की   |
तेरे आमाल काफी हैं  ,
तेरी हस्ती मिटाने को   |

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मेरे बारे में

मेरी फ़ोटो
नाम : आदेश कुमार पंकज पिता का नाम :( स्व०) श्री किशोरी लाल गुप्ता माता का नाम : श्रीमती पुष्पावती गुप्ता जन्म तिथि : ३०.०६ 1963 जन्म स्थान : शाहजहाँपुर (उ .प्र .) शिक्षा : एम ० एस - सी० ( गणित शास्त्र ) एम ० ए० ( अर्थ शास्त्र ) बी० एड० साहित्यिक परिचय : अनेकों कहानी व् कविताएँ विभिन्न पत्र - पत्रिकाओं में प्रकाशित | आकाशवाणी लखनऊ से बाल कविताएँ प्रचारित | अनेकों कवि सम्मेलनों कि अध्यक्षता व् संचालन | कस्तूरी कंचन आगमन संस्था द्वारा प्रकाशित एवम दोहा कलश संयुक्त दोहाकारों के रूप में प्रकाशाधीन | पुरस्कार : अखिल भारतीय वैश्य समाज शाहजहाँपुर द्वारा वैश्य रत्न से सम्मानित | कई कवि सम्मेलनों में विशेष सम्मान | माननीय शिक्षा मंत्री भारत सरकार श्रीमती स्मृति ईरानी द्वारा सम्मानित | विधालय प्रबंधन द्वारा लगातार आठ वर्षों से सम्मानित | वर्तमान में आदित्य बिरला पब्लिक स्कूल , रेनुसागर , सोनभद्र (उ ,प्र .) में प्रवक्ता गणित शास्त्र के पद पर कार्य रत | संपर्क : जूनियर ४५ - ए रेनुसागर ,सोनभद्र (उ.प्र.)- २३१२१८ मोब .नंबर . ९४५५५६७९८१

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