संदेश

मुक्तक

आदमी को आदमी से , प्यार होना चाहिए | हर भवन की नींव का , आधार होना चाहिए |       जिंदगी के सुख - दुःख , बाँट ले हम साथ मिल , दोस्ती हो या दुश्मनी हो , भरपूर होना चाहिए ||

गज़ल

आप मुझसे क्यों हैं रूठें , क्या खता है हो गयी |     बिन बताये ही मुझे वह , क्यों सजा है दे गयी | आप यदि कहते मुझे तो , एक पग पर नाचता ,, पर बेरुखी यह इस तरह , बेबफा क्यों हो गयी | चाँद - सूरज और तारे , रख दूँ तेरे हाथ पर मैं ,, पर बता तू इस तरह ,मुझसे जुदा क्यों हो गयी | संसार की हर चीज़ मैंने , ला रखी तेरे सामने ,, पंकज बता फिर वह मुझे ,क्यों दगा है दे गयी |

कब तक

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कब तक सोती रहेगी यों ही सरकार | कबतक हम खाते रहेंगे यों ही मार | अभी तो हम २५ मई भूले भी नहीं थे , अभी तो हमारे आँसू सूखे भी नहीं थे , अभी तो जख्म भरे भी नहीं थे , कर दिया ७ सितम्बर को एक और प्रहार | कब तक सोती रहेगी ...........................| कभी बनारस , कभी लखनऊ को नापाक किया , कभी हैदराबाद ,अहमदाबाद को है दर्द दिया  , कभी धन कुबेर मुंबई को है रुला दिया , अब तो हमला कर डाला दिल्ली पर अबकी बार | कब तक सोती रहेगी ................................ | कब तक सहते रहेंगे हम , कब तक चुप रहेंगे हम  , देश की जनता पूछ रही है , आज पुकार - पुकार   | कब तक सोती रहेगी ................................ | वे घायलों को देखने जाते हैं  , बड़ा बड़ा काफिला लेकर जातें हैं , लम्बी -लम्बी सलामी लेकर , रुपयों का मरहम लगाकर , वापस आ जाती है उनकी कार | कब तक सोती रहेगी .................................. | कहीं सुरक्षा में चूक हुई है , कहीं सुरक्षा में है खामी  , आतंकवाद की बड़ी लड़ाई , का रटा- रटाया मन्त्र, हम देख रहे हैं ,हम द...

शुभकामना

रोग मुक्त हो तन सबका , आह्ल्लादित हो मन सबका  | जीवन में नया उछाला हो , हर घर में नया उजाला हो | हो जायें खुशियों की भरमार  , नव - वर्ष कहे यह बारम्बार  |  

नव - वर्ष

खुशियों का झुरमुट ले आया ,  यह नव - वर्ष  अपार  | हर पल , हर क्षण  मिले  सफलता , यह कहे - पुकार - पुकार  | 

ग़ज़ल

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तू पथ पर अपने चलता चल  | मंजिल को पास बुलाता चल | सभी समस्याओं का मिलकर , बात -चीत से  निकले  हल  | कैसी भी हो आग भयानक  , कर सकते हो तुम शीतल  | मंदिर हो या गुरुद्वारा हो  , शीश झुका दें  गंगा जल  | चंदा -तारों से हम सीखें ,  कैसे रहते हैं यह हिलमिल | निश्वार्थ भाव से नदिया कैसे , कल-कल कर बहती अविरल | भेद न करती भारत माँ है  , सब पर फैलाये अपना आँचल | पंकज द्वैष-भावना  त्यागो , जीवन बन जायेगा परिमल  |

दोहा

प्राणी ऐसा जगत में , जन्म न लिया कोय  |  होवे पूरा सदगुणी , अवगुण एक न होय  || पंकज विपदा  साथ दे , उसको अपना मान | जस सुनार घिस- घिस करे ,सोने की पहचान  ||