संदेश

मिठ्ठी ; आदेश कुमार पंकज

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बहुत पुराना मेरे घर में , प्यारा - प्यारा तोता है । सुख - दुःख का साथी है , मैं जब सोता , तो सोता है । रोज सवेरे जल्दी उठकर , राम - राम वह जपता है । घर में मेरे जो भी आये , राम - राम वह कहता है । मखमल जैसा हरा वदन , हरी मिर्च वह खाता है । मीठी बोली सदा बोलता , मिठ्ठी वह कहलाता है । रानी मुन्नी के साथ - साथ प्रतिदिन खेला करता है । ख़ुद भूखा रह जाता है , पर उसको खाना देता है ।

मैं हूँ कोयल ; आदेश कुमार पंकज

मैं हूँ कोयल प्यारी - प्यारी, हर पक्षी से मैं हूँ न्यारी । डाल - डाल पर फुदक -फुदक कर मैं मीठा गीत सुनाती हूँ । बागों की मैं रानी हूँ , सबमें खुशहाली लातीं हूँ । मीठे - मीठे संदेशों से , मैं सबका दर्द मिटाती हूँ । मैं हूँ कोयल मतवाली , मैं हूँ कोयल काली - काली । मिसरी जैसी मेरी बोली , मेरी कोयलिया कूँ - कूँ से , झूम उठे क्यारी - क्यारी । मैं हूँ कोयल प्यारी - प्यारी । हर पक्षी से मैं हूँ न्यारी ।

आदेश कुमार पंकज की कविता - मछलियाँ

मछलियाँ , भयभीत हैं । घुटन सी महसूस करती हैं । जलाशय में कुछ मगरमच्छ घुस आयें हैं । मछलियाँ , उठा लेतीं हैं , तलवार और , लड़ती हैं अन्याय के खिलाफ , अन्तिम साँस तक । मछलियाँ पातीं हैं विजय और , रच देतीं हैं एक नया इतिहास ।

आदेश कुमार पंकज का : गीत

यह दृश्य अपरचित लगता है , कोई घटना होने वाली है । कहीं बरस रहा झम - झम पानी , कहीं हवा चल रही तूफानी , कहीं पूरण का चंदा चमके , कहीं रात भयावह काली है । सब उल्टा - पुल्टा होता है , सोना भी मिट्टी होता है , जिस घर को अपना समझा था , वह घर अपनों से खाली है । कुछ अनचाहे मिल जाते हैं , कुछ बिन रोपें उग आते है , जिसको सींचा था पुष्प समझ , वह तो काटों की डाली है । कहीं फुटपाथों पर बचपन रोता , कहीं नर्म सेज पर कुत्ता सोता , कहीं सोने के थाल सज रहे , कहीं न मिलती प्याली है । कहीं न्याय बिक रहा थानों में , कहीं जाम चल रहा मानों में , कहीं सूनी पड़ी झोपड़ी है , कहीं होती नित्य दीवाली है । कुछ सपनों को बुनते है , कुछ जीवन को चुनते है , जिसको मैं मौत समझता था , वह सच्ची जीवन थाली है ।

आशुतोष त्रिपाठी की कविता : दस्तूर अनोखा

आतंक है एक गंभीर समस्या , इसके समक्ष है सब हैं लाचार । निरंतर बढती घोर अमावस्या ऊपर से पड़ती मंदी की मार ॥ दुनिया का दस्तूर अनोखा जिसने पाला उसी को धोखा । नेता लगा रहे हैं हम सब की बोली पैसों से भरतें हैं अपनी झोलीं ॥ किसको किसकी परवाह है कौन निभाता है अपनी जिम्मेदारी । अपनी अपनी ढपली देखो अपने अपने राग , कैसे होगी शांत फैली है जो आग ॥ किसी मोड़ पर हार मिलेगी किसी मोड़ पर जीत । हिम्मत कभी नहीं हारो तुम बन जाओ सहज विनीत ॥

मानसी गुप्ता की बाल कविता ; तितली

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रं ग बि रंगी प्यारी तितली , मेरे घर में आती है । संग खेलती है वह मेरे , मीठे गीत सुनाती है । क्ष्रण में दूर चली जाती है , क्ष्रण में पास , वह आ जाती है । फूलों का रस चूस चूस कर , मीठा शहद पिलाती है ।

मुक्तक

शूल भी क्या फूल भी , सब कटीलें हो गए । डालियों पर जो लगाये , फल कसैले हो गए । बात किसकी अब करून , आदमी या जानवर की , आदमी तो जानवर से , भी विषैले हो गए । आदमी की जिन्दगी क्या , यह लटकता सा तना है । हाथ से पावं तक , हर तरह से यह सना है । है पता उसको नहीं , जिन्दगी की शाम का , क्या उचित अनुचित यहाँ , सब उसी को सोचना है ।